काहे के हमके भेजला हो बाबा
ओही देसवा ..जहा धने पुजाला
बाबू क नेह न माई क पिरितिया
ननदी मारे ले जहां
कस कस तनवा
हमरे खातिर बेच के
आपन सब धनवा
हमार घर जोरे में
कएला सारा जतनवा
तबो इहंवा सबके कमी लागेला
हमरा के सब केहू बोली मारेला
अबकी जे केहू हमसे
कुछो मंगवाई
हमरे से कईसे अब
तोहसे कहल जाई......
ओही देसवा ..जहा धने पुजाला
बाबू क नेह न माई क पिरितिया
ननदी मारे ले जहां
कस कस तनवा
हमरे खातिर बेच के
आपन सब धनवा
हमार घर जोरे में
कएला सारा जतनवा
तबो इहंवा सबके कमी लागेला
हमरा के सब केहू बोली मारेला
अबकी जे केहू हमसे
कुछो मंगवाई
हमरे से कईसे अब
तोहसे कहल जाई......
गाँव-जवार पर आकर यही लगा. अपने लोग अपनी बोली.
जवाब देंहटाएंदर्द और प्रीत का जो भी किस्सा हो, कविता सहज उपलब्ध है निरंतर है
Kshma ji i appriciate ur blog...great....
जवाब देंहटाएंआह, एक पीड़ा जो होठो तक आयी
जवाब देंहटाएंधन्यवाद् आप सबका ..
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